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Shrimadbhagavadgita

Karmanye vadhikaraste ma phaleshu kadachana, Ma karma phala hetur bhur ma te sango stvakarmani.

Second Chapter : Sankhya Yoga

Verse : 01

Meaning: “Sanjaya said- To him (Arjuna), who was thus overwhelmed by pity (kripayāviṣṭam), whose distressed eyes (akuleksanam) were full of tears (ashru-purṇa), and who was thus lamenting (viṣīdantam), Madhusūdana (Krishna) spoke these words.”

Verse : 02

Meaning: “The Supreme Lord said- My dear Arjuna, where has this delusion/impurity (kaśmalam) come upon you in this hour of crisis (viṣame)? It is not befitting a cultured man (anārya-juṣṭam), nor does it lead to heaven (asvargyam), nor will it bring you fame (akīrti-karam), O Arjuna.

Verse : 03

Meaning: The Supreme Lord said- “O Pārtha, do not yield to unmanliness (klaibyam)! It does not become you (na etat tvayi upapadyate). Giving up this petty weakness of the heart (ksudram hridaya-daurbalyaṁ tyaktva), arise (uttishtha), O vanquisher of enemies (Paran-tapa)!”

Verse : 04

Meaning: “Arjuna said- O Madhusūdana, how can I, in battle, attack with arrows revered men like Bhishma and Droṇa, who are worthy of my worship, O destroyer of enemies?”

Verse : 05

Meaning: “It is better to live in this world even by begging (bhaikshyam) without killing these venerable teachers (mahā-anubhāvān gurūn). If we kill these teachers, though they may be greedy for worldly gain (artha-kāmān), we would only enjoy pleasures (bhogān) in this world that are stained with blood (rudhira-pradigdhān).”

Verse : 06

Meaning: “Nor do we know which is better for us: to conquer them or to be conquered by them. The sons of Dhritarashtra, whom we do not wish to kill, stand before us on the battlefield.”

Verse : 07

Meaning: “My nature is now overpowered by the fault of weakness (karpanya-dosha). With a mind bewildered about my duty (dharma-sammudha-chetaḥ), I ask You. Tell me decisively (nishchitam) what is truly best (shreyah) for me. I am Your disciple (shishyas te ’ham); please instruct me, for I have taken refuge in You (tvāṁ prapannam).”

Verse : 08

Meaning: “I certainly do not see what could dispel this grief that is drying up my senses- not even if I were to achieve a prosperous, unrivalled kingdom on Earth, or even sovereignty over the celestial gods.”

Verse : 09

Meaning: “Sanjay Said – Having spoken thus to Hrishikesha (Krishna), Arjuna, the conqueror of sleep (Gudakesha) and the destroyer of foes, said, “I will not fight,” and fell silent.”

Verse : 10

Meaning: “Sanjay Said – O Bharata (Dhritarashtra), to him who was sitting despondent in the midst of the two armies, Hrishikesha (Krishna), smiling as it were, spoke these words.”

Verse : 11

Meaning: “The Supreme Lord said- You grieve for those who should not be grieved for, yet you speak words of wisdom. The wise lament neither for the living nor for the dead.”

Verse : 12

Meaning: “There was never a time when I did not exist, nor you, nor all these kings; nor shall any of us cease to exist hereafter.”

Verse : 13

Meaning: “Just as the embodied soul continuously passes, in this body, from childhood to youth to old age, the soul similarly passes into another body at death. A steady person is not bewildered by this.”

Verse : 14

Meaning: “O son of Kunti (Arjuna), the contact of the senses with their objects (mātrā-sparśhāḥ) gives rise to perceptions of cold and heat, and of happiness and distress (śhītoṣhṇa-sukha-duḥkha-dāḥ). They are non-permanent (anityāḥ), appearing and disappearing (āgamāpāyinaḥ); therefore, O descendant of Bharata, you must simply tolerate them (tāns titikṣhasva).”

Verse : 15

Meaning: “O best among men (Arjuna), the person who is not disturbed by happiness and distress and is steady in both, is certainly eligible for liberation.”

Verse : 16

अनुवाद: “असत् वस्तु का कोई अस्तित्व नहीं होता और सत् वस्तु का कभी अभाव नहीं होता। इन दोनों का ही तत्त्व, तत्त्वदर्शी (ज्ञानी) लोगों ने देखा है।”

Verse : 17

अनुवाद: “तुम उसे अविनाशी जानो, जिससे यह संपूर्ण जगत् व्याप्त है। उस अविनाशी का कोई भी नाश नहीं कर सकता।”

Verse : 18

अनुवाद: “ये सभी शरीर नाशवान कहे गए हैं, जबकि इनके भीतर रहने वाला आत्मा नित्य, अविनाशी और अप्रमेय (अमाप) है। इसलिए हे भारत! तुम युद्ध करो।”

Verse : 19

अनुवाद: “जो इस आत्मा को मारने वाला समझता है और जो इसे मरा हुआ मानता है, वे दोनों ही अज्ञानी हैं। क्योंकि यह (आत्मा) न तो किसी को मारता है और न ही मारा जाता है।”

Verse : 20

अनुवाद: “यह आत्मा न तो कभी जन्म लेता है और न ही कभी मरता है। यह न तो होकर फिर होने वाला है (यानी यह स्वतः-उत्पन्न नहीं होता)। यह आत्मा अजन्मा, नित्य, शाश्वत और पुरातन है। शरीर के मारे जाने पर भी यह नहीं मारा जाता।”

Verse : 21

अनुवाद: “हे पार्थ! जो इस आत्मा को अविनाशी, नित्य, अजन्मा और अविकारी (अपरिवर्तनशील) जानता है, वह पुरुष कैसे किसी को मरवा सकता है या किसे मार सकता है?”

Verse : 22

अनुवाद: “जिस प्रकार मनुष्य पुराने और फटे वस्त्रों को त्यागकर नए वस्त्र धारण करता है, उसी प्रकार जीवात्मा पुराने और जीर्ण शरीरों को त्यागकर नए शरीर को धारण करता है।”

Verse : 23

अनुवाद: “इस आत्मा को शस्त्र काट नहीं सकते, इसे आग जला नहीं सकती, इसे जल गीला नहीं कर सकता, और इसे हवा सुखा नहीं सकती।”

Verse : 24

अनुवाद: “यह आत्मा छेदा नहीं जा सकता, यह जलाया नहीं जा सकता, यह भिगोया नहीं जा सकता और यह सुखाया भी नहीं जा सकता। यह आत्मा नित्य, सर्वव्यापी, स्थिर, अचल और सनातन है।”

Verse : 25

अनुवाद: “यह आत्मा अव्यक्त (अप्रकट), अचिन्त्य (अकल्पनीय) और अविकारी (अविकृत) कही जाती है। इसलिए, इस आत्मा को ऐसा जानकर तुम्हें शोक नहीं करना चाहिए।”

Verse : 26

अनुवाद: “और यदि तुम इसे (आत्मा को) हमेशा जन्म लेने वाला और हमेशा मरने वाला मानते हो, तो भी हे महाबाहु! तुम्हें शोक नहीं करना चाहिए।”

Verse : 27

अनुवाद: “क्योंकि जो जन्मा है, उसकी मृत्यु निश्चित है, और जो मरा है, उसका जन्म निश्चित है। अतः जो अटल है, उस विषय में तुम्हें शोक नहीं करना चाहिए।”

Verse : 28

अनुवाद: “हे भारत (अर्जुन)! सभी प्राणी जन्म से पहले अप्रकट होते हैं, बीच में प्रकट होते हैं, और मरने के बाद फिर से अप्रकट हो जाते हैं। इसलिए इस विषय में शोक करने का क्या कारण है?”

Verse : 29

अनुवाद: “कोई इस आत्मा को आश्चर्य के रूप में देखता है, कोई दूसरा इसे आश्चर्य के रूप में बताता है, और कोई अन्य इसे आश्चर्य के रूप में सुनता है। और कोई कोई तो इसे सुनकर भी नहीं जान पाता।”

Verse : 30

अनुवाद: “हे भारत (अर्जुन)! यह आत्मा (देही) सभी के शरीर में नित्य और अवध्य है। इसलिए, तुम्हें किसी भी प्राणी के लिए शोक नहीं करना चाहिए।”

Verse : 31

अनुवाद: “श्रीभगवान ने कहा: अपने धर्म (कर्तव्य) को देखते हुए भी तुम्हें विचलित नहीं होना चाहिए। क्योंकि क्षत्रिय के लिए धर्मयुद्ध से बढ़कर कोई दूसरा कल्याणकारी कार्य नहीं है।”

Verse : 32

अनुवाद: “श्रीभगवान ने कहा: हे पार्थ! जो क्षत्रिय बिना किसी प्रयास के ऐसे युद्ध का अवसर प्राप्त करते हैं, जो स्वर्ग के द्वार खोलता है, वे वास्तव में भाग्यशाली होते हैं।”

Verse : 33

अनुवाद: “और यदि तुम इस धर्मयुद्ध को नहीं करोगे, तो तुम अपने धर्म और कीर्ति को खोकर पाप को प्राप्त करोगे।”

Verse : 34

अनुवाद: “और लोग तुम्हारी चिरस्थायी बदनामी की बातें करेंगे। क्योंकि एक सम्मानित व्यक्ति के लिए अपयश (बदनामी) मृत्यु से भी बढ़कर होता है।”

Verse : 35

अनुवाद: “जिनके लिए तुम बहुत सम्मानित थे, वे सभी महारथी तुम्हें युद्ध के भय से पीछे हटे हुए मानेंगे, और तुम उनकी दृष्टि में हल्के हो जाओगे।”

Verse : 36

अनुवाद: “तुम्हारे शत्रु तुम्हारी सामर्थ्य की निंदा करते हुए बहुत सी अवाच्य (कठोर) बातें कहेंगे। इससे बढ़कर और क्या दुःख हो सकता है?”

Verse : 37

अनुवाद: “तुम यदि मारे गए तो स्वर्ग को प्राप्त करोगे, और यदि जीत गए तो पृथ्वी का भोग करोगे। इसलिए, हे कुंतीपुत्र! तुम युद्ध के लिए दृढ़ निश्चय करके खड़े हो जाओ।”

Verse : 38

अनुवाद: “सुख-दुःख, लाभ-हानि, और जय-पराजय को समान मानकर तुम युद्ध के लिए तैयार हो जाओ। इस प्रकार तुम्हें कोई पाप नहीं लगेगा।”

Verse : 39

अनुवाद: “यह बुद्धि (ज्ञान) तुम्हें सांख्ययोग के अनुसार बताई गई है। अब तुम इसे (ज्ञान को) कर्मयोग के संदर्भ में सुनो। हे पार्थ! जिस बुद्धि से युक्त होकर तुम कर्म के बंधन से छूट जाओगे।”

Verse : 40

अनुवाद: “इस कर्मयोग में, आरंभ का नाश नहीं होता और न ही कोई बाधा होती है। इस धर्म का थोड़ा-सा भी अभ्यास महान भय (संसार-चक्र के भय) से रक्षा करता है।”

Verse : 41

अनुवाद: “श्रीभगवान ने कहा: हे कुरुनंदन (अर्जुन)! इस योग में निश्चयात्मिका बुद्धि एक ही होती है। परंतु जो अस्थिर मन वाले होते हैं, उनकी बुद्धि बहुत-सी शाखाओं में बँट जाती है और अनंत होती है।”

Verse : 42

अनुवाद: “श्रीभगवान ने कहा: हे पार्थ! जो अविवेकी लोग वेद के कर्मकांड में आसक्त हैं, और जो यह कहते हैं कि इसके अलावा और कुछ नहीं है, वे ऐसी बातें कहते हैं जो फूलों जैसी दिखती हैं।”

Verse : 43

अनुवाद: “जिनका मन कामनाओं में लिप्त है, जो स्वर्ग को ही परम लक्ष्य मानते हैं, और जो जन्म तथा कर्म के फलों को देने वाली, भोग और ऐश्वर्य की प्राप्ति के लिए बहुत सी विशेष क्रियाओं का विधान करते हैं।”

Verse : 44

अनुवाद: “जो लोग भोग और ऐश्वर्य में बहुत आसक्त हैं, और जिनका मन उन बातों (वेद के कर्मकाण्ड) द्वारा हर लिया गया है, उनकी निश्चयात्मिका बुद्धि समाधि (परमात्मा के ध्यान) में स्थिर नहीं हो पाती।”

Verse : 45

अनुवाद: “वेद मुख्य रूप से तीनों गुणों (सत्त्व, रज, तम) से संबंधित विषयों का वर्णन करते हैं। हे अर्जुन! तुम उन तीनों गुणों से ऊपर उठो। द्वंद्वों से मुक्त हो जाओ, हमेशा सत्त्वगुण में स्थित रहो, योग (अप्राप्त की प्राप्ति) और क्षेम (प्राप्त की सुरक्षा) की चिंता छोड़ दो, और आत्म-नियंत्रण में रहो।”

Verse : 46

अनुवाद: “जैसे एक छोटे जलाशय (कुएँ) में जितना प्रयोजन होता है, वह सब तरफ से भरपूर बड़े जलाशय (बाढ़ के जल) के आ जाने पर व्यर्थ हो जाता है। उसी प्रकार तत्त्व को जानने वाले ज्ञानी ब्राह्मण के लिए सभी वेदों में उतना ही प्रयोजन रहता है (जितना उस ज्ञान के पहले था)।”

Verse : 47

अनुवाद: “तुम्हारा अधिकार केवल कर्म करने में है, उसके फल में कभी नहीं। तुम कर्मफल के हेतु (कारण) मत बनो और तुम्हारी अकर्मण्यता (कर्म न करने में) भी आसक्ति न हो।”

Verse : 48

अनुवाद: “हे धनञ्जय (अर्जुन)! आसक्ति को त्यागकर, और सफलता-असफलता में समभाव रखकर योग में स्थित होकर कर्म करो। इसी समता को ही योग कहते हैं।”

Verse : 49

अनुवाद: “हे धनंजय! सकाम कर्म (फल की इच्छा से किया गया कर्म) निष्काम कर्मयोग से बहुत निम्न है। इसलिए तुम बुद्धि (समता) का आश्रय लो। क्योंकि फल की इच्छा रखने वाले लोग दीन (कृपण) होते हैं।”

Verse : 50

अनुवाद: “जो व्यक्ति समत्व बुद्धि से युक्त है, वह इस लोक में पुण्य और पाप दोनों का त्याग कर देता है। इसलिए तुम योग (समत्व बुद्धि) के लिए तैयार हो जाओ, क्योंकि कर्मों में कुशलता ही योग है।”

Verse : 51

अनुवाद: “जो मनुष्य समत्व बुद्धि से युक्त होकर कर्म से उत्पन्न होने वाले फल को त्याग देते हैं, वे मनीषी (ज्ञानी) होते हैं। वे जन्म के बंधन से मुक्त होकर निर्दोष (परम) पद को प्राप्त करते हैं।”

Verse : 52

अनुवाद: “जब तुम्हारी बुद्धि मोह-रूपी दलदल को पार कर जाएगी, तब तुम सुने हुए और सुनने योग्य सभी चीजों के प्रति वैराग्य को प्राप्त होगे।”

Verse : 53

अनुवाद: “जब तुम्हारी बुद्धि अनेक प्रकार की शास्त्रों की बातों से विचलित न होकर स्थिर हो जाएगी और परमात्मा में अचल हो जाएगी, तब तुम योग को प्राप्त होगे।”

Verse : 54

अनुवाद: “अर्जुन ने कहा: हे केशव! समाधि में स्थित स्थितप्रज्ञ व्यक्ति के क्या लक्षण होते हैं? वह स्थितबुद्धि पुरुष कैसे बोलता है, कैसे रहता है, और कैसे चलता है?”

Verse : 55

अनुवाद: “श्रीभगवान ने कहा: हे पार्थ! जब मनुष्य मन में स्थित सभी कामनाओं को पूरी तरह से त्याग देता है, और आत्मा से आत्मा में ही संतुष्ट रहता है, तब उसे स्थितप्रज्ञ कहा जाता है।”

Verse : 56

अनुवाद: “जो दुःख में उद्विग्न नहीं होता, सुख में जिसकी कोई चाह नहीं होती, और जो आसक्ति, भय और क्रोध से रहित है, उसे स्थितधी मुनि कहते हैं।”

Verse : 57

अनुवाद: “जो व्यक्ति सभी जगह (सब विषयों में) आसक्तिरहित है, और जो शुभ या अशुभ को प्राप्त करके न तो प्रसन्न होता है और न ही द्वेष करता है, उसकी बुद्धि (प्रज्ञा) स्थिर है।”

Verse : 58

अनुवाद: “जब यह व्यक्ति कछुए की तरह अपने अंगों को सभी तरफ से समेट लेता है, उसी प्रकार अपनी इंद्रियों को इंद्रियों के विषयों से हटा लेता है, तब उसकी बुद्धि स्थिर होती है।”

Verse : 59

अनुवाद: “बिना भोजन के रहने वाले व्यक्ति की इंद्रियों के विषय तो हट जाते हैं, लेकिन उन विषयों के प्रति आसक्ति (स्वाद) बनी रहती है। लेकिन परम तत्त्व (परमात्मा) का अनुभव होने पर वह आसक्ति भी समाप्त हो जाती है।”

Verse : 60

अनुवाद: “हे कुंतीपुत्र (अर्जुन)! प्रयत्न करते हुए भी, एक विवेकी पुरुष का मन भी प्रमथनशील इंद्रियां जबरदस्ती खींच लेती हैं।”

Verse : 61

अनुवाद: “उन सभी इंद्रियों को वश में करके, एकाग्रचित्त होकर मेरे आश्रित रहना चाहिए। क्योंकि जिसकी इंद्रियाँ वश में हैं, उसकी ही बुद्धि स्थिर होती है।”

Verse : 62-63

अनुवाद: “विषयों का ध्यान करते हुए मनुष्य की उनमें आसक्ति उत्पन्न हो जाती है। आसक्ति से कामना पैदा होती है और कामना की पूर्ति न होने पर क्रोध उत्पन्न होता है।” (६२)

“क्रोध से पूरी तरह से मोह उत्पन्न होता है। मोह से स्मृति में भ्रम पैदा होता है। स्मृति के भ्रम से बुद्धि का नाश होता है। और बुद्धि का नाश होने पर मनुष्य का सर्वनाश हो जाता है।” (६३)

Verse : 64

अनुवाद: “जो व्यक्ति राग (आसक्ति) और द्वेष (घृणा) से रहित होकर, अपनी वश में की हुई इंद्रियों द्वारा विषयों को ग्रहण करता है, वह शांत मन वाला व्यक्ति शांति (प्रसन्नता) को प्राप्त करता है।”

Verse : 65

अनुवाद: “शांति (मन की निर्मलता) प्राप्त होने पर उसके सभी दुःखों का नाश हो जाता है। क्योंकि निर्मल मन वाले व्यक्ति की बुद्धि शीघ्र ही स्थिर हो जाती है।”

Verse : 66

अनुवाद: “अस्थिर मन वाले व्यक्ति की निश्चयात्मिका बुद्धि नहीं होती, और उस अस्थिर मन वाले की भावना (आत्मिक भावना) नहीं होती। और भावनाहीन व्यक्ति को शांति नहीं मिलती, और अशांत व्यक्ति को सुख कहाँ से मिलेगा?”

Verse : 67

अनुवाद: “क्योंकि, जिस व्यक्ति का मन विचरती हुई इंद्रियों के पीछे चलता है, वह इंद्रियाँ उसकी बुद्धि को उसी तरह हर लेती हैं, जैसे हवा पानी में नाव को हर लेती है।”

Verse : 68

अनुवाद: “इसलिए, हे महाबाहो! जिसकी इंद्रियाँ इंद्रियों के विषयों से पूरी तरह से वश में हैं, उसकी बुद्धि स्थिर है।”

Verse : 69

अनुवाद: “जो सभी प्राणियों के लिए रात्रि है, उसमें संयमी (योगी) जागता रहता है। और जिसमें सभी प्राणी जागते हैं, वह ज्ञानी मुनि के लिए रात्रि है।”

Verse : 70

अनुवाद: “जिस प्रकार सब ओर से जल से भरा हुआ और स्थिर समुद्र अपनी मर्यादा में रहता है, उसी प्रकार जिसके मन में सभी कामनाएं प्रवेश करती हैं, वह व्यक्ति शांति को प्राप्त होता है, न कि कामनाओं की पूर्ति चाहने वाला।”

Verse : 71

अनुवाद: “जो व्यक्ति सभी कामनाओं को त्यागकर, इच्छा रहित होकर, और ममता एवं अहंकार से रहित होकर व्यवहार करता है, वही शांति को प्राप्त होता है।”

Verse : 72

अनुवाद: “हे पार्थ! यह ब्राह्मी स्थिति है। इसे प्राप्त करके कोई मोहित नहीं होता। जीवन के अंत समय में भी इसमें स्थित होकर वह ब्रह्मनिर्वाण को प्राप्त होता है।”

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