Skip to content

Shrimadbhagavadgita

Karmanye vadhikaraste ma phaleshu kadachana, Ma karma phala hetur bhur ma te sango stvakarmani.

अठारहवें अध्याय : मोक्ष-संन्यास-योग || Moksha Sannyasa Yoga

    मोक्ष-संन्यास-योग अर्जुन उवाच सन्न्यासस्य महाबाहो तत्त्वमिच्छामि वेदितुम्।त्यागस्य च हृषीकेश पृथक्केशिनिसूदन।।१।। अनुवाद: अर्जुन ने कहा – “हे महाबाहो! हे हृषीकेश (इंद्रियों के स्वामी), हे केशि-सूदन (केशि नामक राक्षस को मारने वाले), मैं आपसे संन्यास और त्याग… 

    सत्रहवाँ अध्याय : श्रद्धात्रय-विभाग-योग || Shraddhatraya Vibhag Yoga

      सत्रहवाँ अध्याय : श्रद्धात्रय-विभाग-योग श्लोक : 0१ अर्जुन उवाचये शास्त्रविधिमुत्सृज्य यजन्ते श्रद्धयान्विताः।तेषां निष्ठा तु का कृष्ण सत्त्वमाहो रजस्तमः।।१।। अनुवाद: अर्जुन ने कहा: हे कृष्ण! जो लोग शास्त्र के विधि-विधानों को छोड़कर श्रद्धा से युक्त होकर… 

      सोलहवाँ अध्याय : दैवासुर-संपद्-विभाग-योग || Daivasur Sampad Vibhag Yoga

        सोलहवाँ अध्याय : दैवासुर-संपद्-विभाग-योग श्लोक : 0१–0३ श्रीभगवानुवाचअभयं सत्त्वसंशुद्धिर्ज्ञानयोगव्यवस्थितिः।दानं दमश्च यज्ञश्च स्वाध्यायस्तप आर्जवम्।।१।। अहिंसा सत्यमक्रोधस्त्यागः शान्तिरपैशुनम्।दया भूतेष्वलोलुप्त्वं मार्दवं ह्रीरचापलम्।।२।। तेजः क्षमा धृतिः शौचमद्रोहो नातिमानिता।भवन्ति सम्पदं दैवीमभिजातस्य भारत।।३।। अनुवाद: श्रीभगवान ने कहा: हे भारत! अभय, अंतःकरण… 

        पंद्रहवाँ अध्याय : पुरुषोत्तम-योग || Purushottam Yoga

          पंद्रहवाँ अध्याय : पुरुषोत्तम-योग श्लोक : 0१ श्रीभगवानुवाचऊर्ध्वमूलमधःशाखमश्वत्थं प्राहुरव्ययम्।छन्दांसि यस्य पर्णानि यस्तं वेद स वेदवित्।।१।। अनुवाद: श्रीभगवान ने कहा: जिसका मूल (जड़) ऊपर की ओर है और जिसकी शाखाएँ नीचे की ओर हैं, उस संसार… 

          चौदहवाँ अध्याय : गुणत्रय-विभाग-योग || Gunatraya Vibhaga Yoga

            चौदहवाँ अध्याय : गुणत्रय-विभाग-योग श्लोक : 0१ श्रीभगवानुवाचपरं भूयः प्रवक्ष्यामि ज्ञानानां ज्ञानमुत्तमम्।यज्ज्ञात्वा मुनयः सर्वे परां सिद्धिमितो गताः।।१।। अनुवाद: श्रीभगवान ने कहा: मैं तुम्हें फिर से सभी ज्ञानों में उत्तम और परम ज्ञान बताऊँगा, जिसे जानकर… 

            तेरहवाँ अध्याय : क्षेत्र-क्षेत्रज्ञ-विभाग-योग || Kshetra Kshetrajna Vibhag Yoga

              तेरहवाँ अध्याय : क्षेत्र-क्षेत्रज्ञ-विभाग-योग श्लोक : 0१ अर्जुन उवाचप्रकृतिं पुरुषं चैव क्षेत्रं क्षेत्रज्ञमेव च।एतद्वेदितुमिच्छामि ज्ञानं ज्ञेयं च केशव।।१।। अनुवाद: अर्जुन ने कहा: हे केशव! मैं प्रकृति और पुरुष, तथा क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ को जानना चाहता… 

              बारहवाँ अध्याय : भक्ति-योग || Bhakti Yoga

                बारहवाँ अध्याय : भक्ति-योग श्लोक : 0१ अर्जुन उवाचएवं सततयुक्ता ये भक्तास्त्वां पर्युपासते।ये चाप्यक्षरमव्यक्तं तेषां के योगवित्तमाः।।१।। अर्जुन ने कहा: जो भक्त निरंतर आपमें लगे रहकर आपकी सगुण रूप में उपासना करते हैं, और जो… 

                ग्यारहवाँ अध्याय : विश्व-रूप-दर्शन-योग || Vishvarupa Darsana Yoga

                  ग्यारहवाँ अध्याय : विश्व-रूप-दर्शन-योग श्लोक : 0१ अर्जुन उवाचमदनुग्रहाय परमं गुह्यमध्यात्मसञ्ज्ञितम्।यत्त्वयोक्तं वचस्तेन मोहोऽयं विगतो मम।।१।। अनुवाद: अर्जुन ने कहा: मुझ पर अनुग्रह करने के लिए आपने जो परम गोपनीय अध्यात्म ज्ञान से युक्त वचन कहे,… 

                  दसवाँ अध्याय : विभूति-योग || Vibhuti Yoga

                    दसवाँ अध्याय : विभूति-योग श्लोक : 0१ श्रीभगवानुवाचभूय एव महाबाहो श्रृणु मे परमं वचः।यत्तेऽहं प्रीयमाणाय वक्ष्यामि हितकाम्यया।।१।। श्रीभगवान ने कहा: हे महाबाहो (अर्जुन)! मेरे परम वचन को फिर से सुनो, जिसे मैं तुम्हारे हित की… 

                    नवाँ अध्याय : राजविद्या-राजगुह्य-योग || Raj Vidya Raj Guhya Yoga

                      नवाँ अध्याय : राजविद्या-राजगुह्य-योग श्लोक : 0१ श्रीभगवानुवाचइदं तु ते गुह्यतमं प्रवक्ष्याम्यनसूयवे।ज्ञानं विज्ञानसहितं यज्ज्ञात्वा मोक्ष्यसेऽशुभात्।।१।। अनुवाद: श्रीभगवान ने कहा: हे अर्जुन! मुझसे ईर्ष्या न करने वाले तुझे मैं यह अति गोपनीय ज्ञान और विज्ञान कहूँगा,…